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शनिवार, 14 मार्च 2009

रौशनी की और !
रंग कुछ भी हो- खिल कर उभरना चाहिए,
छिपी हो टीस सीने में - शोला बन जाना चाहिए,
अरमान कुछ भी हो दिल में - पूरा हो जाना चाहिए
असफलताओं के समंदर में - "कड़ी--उम्मीद" से जुड़ जाना चाहिए
वक्त बहुत गुजर चुका - अब तो समझ जाना चाहिए
मै तो टिमटिमाता दिया हूँ दोस्तों,
लेकिन अब हर सीने से - सूरज निकलना चाहिए
वक्त कुछ इस कदर है हावी हो गया,
अब तो यह वक्त बदलना चाहिए
आओ सब मिल कर शामिल हों इस "आर्थिक आजादी के अभियान" में
कि, हर घर की चिमनी से अब धुआं निकलना चाहिए
मूल रचना: डॉ प्रवीण शर्मा

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